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Utangan: उटंगन के हैं ढेर सारे फायदे – Acharya Balkrishan Ji (Patanjali)

वानस्पतिक नाम :   Blepharis edulis (Forssk.) Pers. (ब्लेफेरिस् इडुलिस)

Syn-Blepharis persica (Burm.f) O. Kuntze

कुल :   Acanthaceae (ऐकेन्थेसी)

अंग्रेज़ी नाम :   Blepharis (ब्लेफेरिस)

संस्कृत-उष्ट्रकाण्डी, ग्राहका, कुक्कुटा, कुर्कुटा, श्रीवरक, श्वेतवरा, सूच्यावह, स्वस्तिक; हिन्दी-कामवृद्धि, उटङ्गन, उटिंगन, उतञ्जन; उर्दू-तुप उट्टन्जन (Tup uttanjan), तुख्मे-उटङ्गन (Tukhame-uttangan); गुजराती-उटीङ्गण (Utingana); बंगाली-शुशनी (Shushani); पंजाबी-उट्टङ्गन (Uttangan); मराठी-उटङ्गन (Utangan), कारडु (Kardu)।   

अरबी-करीज (Kariz), बजुल करीज (Bazul qariz); फारसी-अन्जरा (Anjara), तुख्मे-अन्जरा (Tukhme-anjrah)।

परिचय

उटंगन के पौधे सजल या नमी युक्त शीतल स्थानों में तथा नदी के किनारे उत्पन्न होते हैं। इसके पत्ते चांगेरी के समान एक साथ चार-चार लगे हुए होते हैं। इसके पत्र सुंगधित होते हैं। इनके पत्रों का शाक बनाकर खाया जाता है तथा यह कहा जाता है कि इसका शाक निद्राजनक होता है।

आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव

उटंगन तिक्त, उष्ण, रुचिकारी तथा हृद्रोग शामक होता है। इसके बीज मधुर, तिक्त, शीत, वृष्य, संतर्पण, गुरु, स्निग्ध, पिच्छिल तथा मूत्रल होते हैं।

औषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि

  1. श्वास-कास-1-2 ग्राम उटिंगन बीज चूर्ण का सेवन करने से अथवा उटिंगन के बीजों को पीसकर छाती पर लगाने से श्वास तथा कास आदि वक्ष विकारों तथा प्रदर रोग  में लाभ होता है।
  2. उटंगन पञ्चाङ्ग को काटकर, सुखाकर क्वाथ बनाकर पीने से श्वास-कास में लाभ होता है।
  3. मूत्रकृच्छ्र-1-2 ग्राम उटिंगन बीज चूर्ण को मट्ठे के साथ मिलाकर अथवा समान भाग मिश्री मिलाकर सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र तथा मूत्राघात में लाभ होता है।
  4. 5-10 ग्राम ताजे पञ्चाङ्ग स्वरस में मिश्री मिलाकर शरबत बनाकर पीने से प्रदर, प्रमेह तथा पित्तज विकारों में लाभ होता है।
  5. वीर्य-विकार-10 ग्राम उटंगन बीज में समभाग गोक्षुर मिलाकर 200 मिली दूध में पकाएं, आधा शेष रहने पर छानकर शीतल करके मिश्री मिलाकर पीने से वीर्य-विकारों का शमन होता है तथा वीर्य पुष्ट होता है।
  6. आर्तव विकार-1-2 ग्राम उटंगन पत्र चूर्ण का सेवन करने से आर्तव विकारों में लाभ होता है।
  7. ताजे पत्रों का स्वरस निकालकर 5 मिली स्वरस में समभाग शहद मिलाकर पीने से रक्तवमन तथा रक्तप्रदर में लाभ होता है।
  8. व्रण-उटंगन के पत्तों को पीसकर घाव पर लगाने से घाव जल्दी भरता है तथा सतजन्य रक्तस्राव का स्तम्भन होता है।
  9. दद्रु-उटंगन के पञ्चाङ्ग को पीसकर उसमें समभाग चक्रमर्द पञ्चाङ्ग कल्क मिलाकर दद्रु में लगाने से दद्रु का शमन होता है।
  10. कण्डू-उटंगन के पत्रों को पीसकर प्रभावित स्थान पर लेप करने से कण्डू का शमन होता है।
  11. उटंगन के पत्रों का रस निकालकर लगाने से अंगुलियों के मध्य में होने वाले व्रण का रोपण होता है।
  12. 1-2 ग्राम बीज चूर्ण में समभाग मिश्री तथा शहद मिलाकर सेवन करने से शरीर की दुर्बलता मिटती है तथा शरीर पुष्ट होता है।
  13. उरुस्तम्भ-उटिंगन के पत्तों का कम तैल में भूनकर नमक रहित शाक बनाकर सेवन करने से उरुस्तम्भ में लाभ होता है।
  14. अनिद्रा-उटिंगन के पत्तों का शाक बनाकर खाने से नींद अच्छी आती है।

प्रयोज्याङ्ग :  बीज तथा पत्र।

मात्रा :  बीज चूर्ण 1-2 ग्राम या चिकित्सक के परामर्शानुसार।