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Beli: बेली के हैं बहुत चमत्कारिक लाभ- Acharya Balkrishan Ji (Patanjali)

वानस्पतिक नाम : Naringi crenulata (Roxb.) Nicolson (नारिंगी क्रेनुलाटा)

Syn. Hesperethusa crenulata (Roxb.) M.Roem; Limonia crenulata Roxb.

कुल : Ruteaceae (रूटेसी)

संस्कृत-बिल्वपर्णी; हिन्दी-बेली; उड़िया-भेंटा (Bhenta); कन्नड़-नयीबुलल (Nayibullal); तमिल-नयेविला (Nayvila); तेलुगु-टोरा-इलागा (Tora-elaga); मलयालम-कटुनारकन (Kattunarakan); मराठी-टोंडसा (Tondsha)।

परिचय

समस्त भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में व पर्णपाती वनों में यह पाया जाता है।

यह छोटा, चिकना, कंटकित, पर्णपाती, लगभग 6 मी तक ऊँचा, झाड़ीदार वृक्ष होता है। इसकी छाल धूसर वर्ण की, खुरदरी तथा कंटकित होती है। कांटे एकल या संख्या में 2-2, लगभग 2.5 सेमी लम्बे तथा सीधे होते हैं। इसके पत्ते संयुक्त, 2.5-5 सेमी लम्बे, 3-7 पर्णक युक्त, चमकीले, अग्रभाग पर नुकीले तथा पक्ष युक्त होते हैं। इसके पुष्प छोटे, रोमश होते हैं। इसके फल गोल, स्वाद में तिक्त तथा 11-4 बीज युक्त होते हैं।

आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव

यह ज्वरघ्न, अपस्माररोधी, विरेचक तथा बलकारक होता है।

इसकी मूल विरेचक होती है।

इसके फल बलकारक, तिक्त तथा कषाय होते हैं।

औषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि

  1. अजीर्ण-1-2 ग्राम मूल चूर्ण का गुनगुने पानी के साथ सेवन करने से अजीर्ण में लाभ होता है।
  2. रोमकूपशोथ-छाल को पीसकर गर्मकर, पुल्टिस बनाकर बांधने से रोमकूपशोथ में लाभ होता है।
  3. पत्रों को पीसकर त्वचा में लगाने से दद्रु तथा कण्डू आदि त्वचा विकारों का शमन होता है।
  4. पत्रों का क्वाथ बनाकर व्रणों को धोने से व्रण का शोधन तथा रोपण होता है।
  5. पत्रों को पीसकर चेहरे पर लगाने से झांई, व्यंग तथा नीलिका आदि त्वचा विकारों का शमन होता है।
  6. पत्र तथा छाल को पीसकर नाड़ी व्रण पर लगाने से व्रण का शोधन तथा रोपण होता है।

प्रयोज्याङ्ग  : पञ्चाङ्ग।

मात्रा  : चिकित्सक के परामर्शानुसार।