विपाक (Post-Digestive Effect)

जठराग्नि के संयोग से द्रव्यों के पाचन के समय जो अन्य रस उत्पन्न होता है, उसे विपाक कहा जाता है7। इस प्रकार की अन्तिम स्थिति में किसी द्रव्य में जो रस उत्पन्न होता है, वही विपाक है। पाचन के दौरान जठरात्र-प्रणाली में खाद्य-पदार्थ में अनेक प्रकार के पाचक रस मिलते हैं। जिससे उसमें अनेक प्रकार के परिवर्तन आते हैं। भोजन अपने पाचन-क्रिया के समय तीन अवस्थाओं से गुजरता है- प्रथम अवस्था में रस का स्वाद मधुर, द्वितीय अवस्था में अम्ल तथा तीसरी अवस्था में कटु रस वाला होता है।

पाचन की अन्तिम अवस्था में द्रव्य का सार और किट्टभाग (मल भाग) अलग-अलग हो जाते हैं। मल भाग के अलग हो जाने पर सार-भाग केवल रस के रूप में शेष रह जाता है। यह द्रव्य का नया ही रूप होता है और उसका रस भी नया उत्पन्न होता है, यही विपाक है।

विपाक के भेद-

रस के आधार पर विपाक के तीन भेद हैं- मधुर, अम्ल और कटु। मधुर और लवण रसों का विपाक प्रायः मधुर, अम्ल रस का प्रायः अम्ल और कटु, तिक्त एवं  कषाय रसों का विपाक प्रायः कटु होता है8। कभी-कभी इस नियम का अपवाद भी मिलता है। जैसे-

विपाक का प्रभाव-विपाक का प्रभाव मधुर आदि रसों के अनुसार ही होता है।

मधुर विपाक- गुरु, मल-मूत्र को साफ करने वाला तथा कफ और शुक्र का पोषक होता है।

अम्ल विपाक-लघु, मल-मूत्र को साफ करने वाला शुक्रनाशक और पित्तवर्धक होता है ।

कटु विपाक-वातवर्धक, शुक्रनाशक, कफहर व मल-मूत्र को बांधने वाला होता है।

आचार्य श्री बालकृष्ण

आचार्य बालकृष्ण, आयुर्वेदिक विशेषज्ञ और पतंजलि योगपीठ के संस्थापक स्तंभ हैं। चार्य बालकृष्ण जी एक प्रसिद्ध विद्वान और एक महान गुरु है, जिनके मार्गदर्शन और नेतृत्व में आयुर्वेदिक उपचार और अनुसंधान ने नए आयामों को छूआ है।

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आचार्य श्री बालकृष्ण

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