प्रभाव (Specific Action)

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि औषधि-द्रव्य रस, वीर्य या विपाक के आधार पर शरीर में कार्य करते हैं, परन्तु इन रस आदि में से कुछ द्रव्य शरीर में किसी के भी अनुरूप कार्य नहीं करते अर्थात् उनकी शरीर पर सर्वथा अलग प्रकार की क्रिया होती है, जिससे रोगविशेष शान्त होता है या बढ़ जाता है। जिस तत्त्व के आधार पर यह विशेष प्रकार की क्रिया होती है, वह तत्त्व ही प्रभाव कहलाता है9 दूसरे शब्दों में, दो द्रव्यों में रस, वीर्य, विपाक की समानता होने पर जो विशेष (भिन्न) कार्य प्रकट होता है, वही प्रभाव माना जाता है। प्रभाव के कारण ही रस आदि तत्त्वों के एक जैसे होने पर भी, कोई औषधि किसी रोग में लाभदायक होती है, तो दूसरी उसी रोग में हानिकारक सिद्ध होती है। उदाहरण के लिए, दन्ती (जमालगोटा) और चित्रक, दोनों का रस और विपाक कटु है तथा वीर्य उष्ण है, फिर भी दन्ती विरेचक है, चित्रक नहीं। मुलेठी और द्राक्षा दोनों के रस, वीर्य, विपाक एक समान हैं, परन्तु मुलेठी वामक (उल्टी कराने वाली) है, पर द्राक्षा बिल्कुल नहीं। इसी प्रकार घी और दूध के रस, वीर्य और विपाक भी समान हैं परन्तु घी अग्निदीपक (पाचन-शक्ति बढ़ाने वाला) है, जबकि दूध नहीं।

कुछ औषधियों को बाँधने या पहनने मात्र से ज्वर, अनिद्रा आदि रोग ठीक हो जाते हैं। जैसे- सहदेवी की जड़ को सिर पर बाँधने से ज्वर ठीक हो जाता है। अनेक धर्म़ों व सम्प्रदायों में अलग-अलग तरह के ताबीज, मणि आदि पहनने, मत्र-जाप एवं अन्य धार्मिक कृत्यों को करने से जो रोग आदि पर प्रभाव पड़ता है, उसका कारण भी उनमें विद्यमान प्रभाव ही है।

प्रभाव के आधार पर द्रव्यों को तीन प्रकार से जाना जा सकता है-

  1. शमन द्रव्य- जो वात आदि दोषों को शान्त करते हैं।
  2. कोपन द्रव्य- जो द्रव्य वात आदि दोषों और रस, रक्त आदि धातुओं को कुपित करते हैं।

3. स्वास्थ्य-हितकारी द्रव्य- जो द्रव्य स्वास्थ्य को बनाये रखने में सहायक होते हैं। इस प्रकार द्रव्यों के विषय में ज्ञान प्राप्त करने के लिए रस आदि तत्त्वों को जानना आवश्यक हो जाता है, क्योंकि ये द्रव्य रस, वीर्य, विपाक व प्रभाव के माध्यम से ही शरीर पर क्रिया करते हैं। इनमें जो-जो तत्त्व अधिक बलशाली होता है, वह दूसरे तत्त्वों के प्रभाव को दबा देता है। इस दृष्टि से रस की अपेक्षा विपाक अधिक बलशाली है, क्योंकि वह रस को बअसर है, रस और विपाक की अपेक्षा वीर्य अधिक बलशाली है, क्योंकि वीर्य इन दोनों के गुणों को दबा देता है। इस क्रम से द्रव्यों में रस सबसे कम बलशाली है, तो प्रभाव सबसे अधिक बलशाली। इस प्रकार रस, विपाक, वीर्य एवं प्रभाव, ये उत्तरोत्तर बलशाली होते हैं।

आचार्य श्री बालकृष्ण

आचार्य बालकृष्ण, आयुर्वेदिक विशेषज्ञ और पतंजलि योगपीठ के संस्थापक स्तंभ हैं। चार्य बालकृष्ण जी एक प्रसिद्ध विद्वान और एक महान गुरु है, जिनके मार्गदर्शन और नेतृत्व में आयुर्वेदिक उपचार और अनुसंधान ने नए आयामों को छूआ है।

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