द्वौप्रस्थौ स्वरसाद् ब्राह्म्या घृतप्रस्थं च साधितम्।। व्योषश्यामात्रिवृद्दन्तीशङ्खपुष्पीनृपद्रुमैः। ससप्तलाकृमिहरैः कल्कितैरक्षसम्मितैः।।पलवृद्ध्या प्रयुञ्जीत परं मात्रा चतुष्पलम्। अ.हृ.उ.6/23-25
| क्र.सं. | घटक द्रव्य | प्रयोज्यांग | अनुपात |
| 1 | ब्राह्मी स्वरस (Centella asiatica (Linn.) Urban) | पंचांग | 1.536 ली. |
| 2 | गोघृत (Cow’s ghee) | 768 ग्रा. | |
| 3 | शुण्ठी (Zingiber officinale Rosc.) कन्द | 12 ग्रा. | |
| 4 | मरिच (Piper nigrum Linn.) | फल | 12 ग्रा. |
| 5 | पिप्पली (Piper longum Linn.) | फल | 12 ग्रा. |
| 6 | कृष्ण त्रिवृत् (Operculina turpethum) | मूल | 12 ग्रा. |
| 7 | दन्ती (Balio spermum montanum Muelli-Arg.) | मूल | 12 ग्रा. |
| 8 | शंखपुष्पी (Convolvulus pluricaulis) | पंचांग | 12 ग्रा. |
| 9 | आरग्वध (Cassia fistula) | फल | 12 ग्रा. |
| 10 | षट्पल | पंचांग | 12 ग्रा. |
| 11 | विडंग (Embelia ribes Burm. f.) | फल | 12 ग्रा. |
मात्रा– 12 ग्रा.
अनुपान– कोष्ण दुग्ध या जल
गुण और उपयोग– यह घृत उत्तम स्मरणशक्तिवर्धक है, इसके सेवन से सभी तरह के मानसिक दोष नष्ट होते हैं।
अपस्मार उन्माद, बोलने में हकलाना, साफ–साफ न बोलना, मिनमिना कर बोलना, जल्दी–जल्दी बोलना, बुद्धि की निर्बलता, गला बैठना, वातरक्त तथा त्वचा रोग, यह सभी इसके सेवन से नष्ट होते हैं।
नियमित रुप से इसका सेवन करने से स्वर मधुर हो जाता है, मुख कान्तियुक्त होता है एवं स्मरणशक्ति बहुत अच्छी हो जाती है।