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Vrintaak: वृन्ताक के हैं कई जादुई लाभ- Acharya Balkrishan Ji (Patanjali)

वानस्पतिक नाम : Solanum melongena Linn. (सोलेनम् मेलोंजेना)

Syn-Solanum esculantum Dunal

कुल : Solanaceae (सोलैनेसी)

अंग्रेज़ी नाम : Brinjal (ब्रिंजल)

संस्कृत-वृंताक, वार्ताकी, भण्टाकी, वार्त्ताकफ, भाण्टिका; हिन्दी-भंटा, बैंगन, बैगुन; उड़िया-बैंगन (Bangan); उर्दु-बेंगन (Baigan);  कन्नड़-बदने (Badne), गुलबदने (Gullbadane); गुजराती-रिङ्गाणा (Ringana), वेंगण (Vengan); तमिल-कत्तरिक्काइ (Kattrikkayi); तेलुगु-बंकाया (Bankaya), वेरीवेंगा (Verri vanga); नेपाली-भाण्टा (Bhanta); बंगाली-बेगुन (Begun); मराठी-वांगे (Vange), वांगी (Vangi); मलयालम-वालूटीना (Valutina)।

अंग्रजी-एग प्लान्ट (Egg plant); अरबी-बादेन्जान (Baadenjaan); फारसी-बदींजान (Badinjan)।

परिचय

यह विश्व के सभी उष्ण क्षेत्रों में तथा भारत में विस्तृत रूप से शाक के रूप में इसकी खेती की जाती है। फल के आकार तथा रंग के भेद से यह कई प्रकार का होता है।

यह 60-100 सेमी ऊँचा, शाकीय, कंटकित अथवा कदाचित् कंटकरहित, शाक होता है। काण्ड के नवीन भाग सघन रोमश होते हैं। इसके पत्र 7.5-15 सेमी लम्बे एवं 5-10 सेमी चौड़े, कंटकयुक्त, अण्डाकार तथा अनेक भागों में विभक्त होते हैं। पुष्प गहरे नीलाभ (बैंगनी) वर्ण के होते हैं। इसके फल 2.5-20 सेमी लम्बे, गहरे बैंगनी वर्ण के, श्वेत अथवा पीत वर्ण के, लम्बे, अण्डाकार अथवा गोलाकार होते हैं। बीज अनेक, पीत अथवा पीताभ-श्वेत वर्ण के होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल कृषि अवस्था के 3-4 माह पश्चात् होता है।

आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव

बैंगन कटु, तिक्त, मधुर, उष्ण, लघु, तीक्ष्ण, स्निग्ध, क्षारीय, कफवातशामक, दीपन, शुक्रकारक, रुचिकारक, हृद्य, वृष्य, बृंहण, ग्राही, निद्राकर, चक्षुष्य, पित्तल तथा शोणितवर्धक होता है।

यह ज्वर, कास, अरुचि, कृमि, अर्श, हृल्लास तथा श्वासनाशक है।

अङ्गार पर भुना हुआ बैंगन अत्यन्त लघु, अग्निदीपन तथा किञ्चित् पित्तकारक होता है।

तैल तथा नमक युक्त भुना बैंगन गुरु तथा स्निग्ध होता है।

श्वेत बैंगन अर्श में हितकर तथा बैंगन की अपेक्षा हीन गुण वाला होता है।

बैंगन का पक्व फल क्षार युक्त, गुरु, पित्तकारक तथा वातकोपक होता है।

बैंगन की  मूल श्वासकष्टरोधी, रेचक, वेदनाहर एवं हृद्य होती है।

यह तत्रिकाशूल, हृद्दौर्बल्य, शोथ, नासागत व्रण, अजीर्ण, ज्वर, हृदयगत रोग, श्वासगतरोग, श्वासनलिकाशोथ, श्वासकष्ट, विसूचिका एवं मूत्रकृच्छ्र शामक होता है।

औषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि

  1. कर्णशूल-बैंगन मूल स्वरस को 1-2 बूंद कान में डालने से कान की वेदना तथा सूजन का शमन होता है।
  2. आंख का जाला-बैंगन की मूल को पानी में घिसकर आंखों पर अंजन करने से आंखों का जाला मिटता है।
  3. दंतशूल-बैंगन की जड़ का चूर्ण बनाकर दांतों पर रगड़ने से दंतशूल का शमन होता है।
  4. उदर विकार-बैंगन के कच्चे फल से निर्मित शाक का सेवन अजीर्ण तथा अरुचि में पथ्य है।
  5. वमन-5 मिली बैंगन पत्र स्वरस में 5 मिली ताजा आर्द्रक स्वरस मिलाकर पिलाने से छर्दि (वमन/उल्टी) बन्द हो जाती है।
  6. रक्तार्श-2-3 ग्राम बैंगन के पत्तों को महीन पीसकर उसमें जीरा और शक्कर मिलाकर सेवन कराने से अर्श जन्य रक्तस्राव तथा पीड़ा का शमन होता है।
  7. मूत्र विकार-5 मिली बैंगन मूल स्वरस को पिलाने से मूत्र त्याग के समय होने वाली वेदना का शमन होता है।
  8. उपदंश-10-20 मिली बैंगन मूल क्वाथ का सेवन करने से उपदंश तथा फिरङ्ग में लाभ होता है।
  9. अण्डकोष वृद्धि-बैंगन की मूल को पीसकर अण्डकोष में लेप करने से अण्डकोष वृद्धि का शमन होता है।
  10. संधिवेदना-बैंगन को भूनकर, पीसकर बांधने से संधिवेदना का शमन होता है।
  11. व्रण-बैंगनमूल चूर्ण को पानी में उबालकर, शीतलकर घाव को धोने से घाव का शोधन तथा रोपण होता है।
  12. शोथ-बैंगन की मूल को पीसकर लगाने से सूजन मिटती है।
  13. खुजली-बैंगन के पत्तों तथा फलों को कुचलकर उसमें शक्कर मिलाकर प्रभावित स्थान पर लगाने से खुजली मिटती है।
  14. नारू-बैंगन को भूनकर दही के साथ मिलाकर नारू के स्थान पर बांधते रहने से लाभ होता है।
  15. कण्डू-बैंगन के पत्तों तथा फलों को पीसकर उसमें शक्कर मिलाकर लगाते हैं तथा थोड़ी देर बाद गुनगुने पानी से धो लेते हैं, इससे खुजली में शीघ्र लाभ मिलता है।
  16. एलुआ, टंकण, हींग, सौवर्चल नमक तथा एरण्ड मूल के चूर्ण को बैंगन फल स्वरस से पीसकर शिशु के पेट पर लेप करने से आध्मान (अफारा) के कारण उत्पन्न उदरशूल का शमन होता है।
  17. अनिद्रा-बैंगन के भरते में शहद मिलाकर सेवन करने से नींद अच्छी आती है।
  18. गृध्रसी-1 बैंगन को एरण्ड तैल में तलकर, उसमें यथोचित मात्रा में हींग तथा नमक मिलाकर सेवन करने से गृध्रसी में लाभ होता है।
  19. शोथ-वेदनायुक्त शोथ स्थान पर बैंगन को पकाकर, उसकी पुल्टिस बनाकर बांधने से लाभ होता है।
  20. आघात या चोटजन्य वेदना-बैंगन को भूनकर उसमें हल्दी व प्याज मिलाकर बाँधने तथा भुने हुए बैंगन के 10-15 मिली स्वरस में थोड़ा गुड़ मिलाकर खाने से लाभ होता है।
  21. स्वेदाधिक्य-बैंगन को पीसकर लगाने से अधिक पसीना निकलना बंद हो जाता है।
  22. बैंगन पत्र से निर्मित क्वाथ का आंखों में अंजन करने पर धत्तूर मद का निवारण होता है।
  23. बैंगन के फलों को काटकर पानी में मसलकर पिलाने से धतूरे का विष उतरता है।
  24. बैंगन के बीज स्वरस को 5 मिली मात्रा में पिलाने से धत्तूरे का विष नष्ट हो जाता है।

प्रयोज्याङ्ग  : मूल, पत्र तथा फल।

मात्रा  : चिकित्सक के परामर्शानुसार।

विशेष  :

  1. बैंगन का फल गुरु एवं दुर्जर होने से इसका अत्यधिक सेवन हानिकारक होता है, यह वातकारक होता है, किंतु बैंगन का विधिपूर्वक उपयोग करने से धमनियों में उभरे हुए दोष शांत होते हैं, नाड़ियों की जड़ता दूर होती है।
  2. जिसके नेत्रों में सदैव पीड़ा, लालिमा तथा दाह रहता हो, पित्त प्रकृति हो, विबन्ध या कोष्ठबद्धता हो, मुख से लालास्राव अत्यधिक होता हो, नकसीर हो तथा जीर्ण अर्श रोग से ग्रसित हो, उसे बैंगन का सेवन नहीं करना चाहिए।
  3. सर्वसाधारण स्वस्थ व्यक्ति को अधिक बीजयुक्त, शुष्क, बासी तथा पककर पीले पड़े हुए बैंगन का सेवन नही करना चाहिए।

4. बैंगन का सेवन शीतकाल में लाभप्रद होता है। अन्य ऋतुओं में स्वास्थ्य तथा आरोग्य की दृष्टि से बैंगन का सेवन करने वाले व्यक्तियों को आहार में दही व तक्र का उपयोग करते रहना  चाहिए।