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डाइट में इन बदलावों से बढ़ती है रोग प्रतिरोधक क्षमता : आयुर्वेदिक नजरिया

मौसम में थोडा सा बदलाव होने पर ही कई लोग तुरंत सर्दी-जुकाम और फ्लू की चपेट में आ जाते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि बाकी लोग उसी मौसम में स्वस्थ रहते हैं फिर आपको ही क्यों जुकाम हो जाता है? दरअसल हमारे शरीर में प्राकृतिक रुप से ही रोगों से लड़ने की शक्ति होती है जिसे हम रोग प्रतिरोधक क्षमता या इम्युनिटी कहते हैं। अगर शरीर की इम्युनिटी मजबूत है तो आप जल्दी बीमार नहीं पड़ेगें।

अब यह जानना जरूरी है कि आखिर इम्युनिटी को बढ़ाया कैसे जाए? आपके खानपान से ही इम्युनिटी निर्धारित होती है। भोजन हमारे स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण तो है लेकिन इसके साथ-साथ यह जानना भी ज़रूरी है कि भोजन किस प्रकार और किन परिस्थियों में किया जाए। अगर आपको भोजन के अलग अलग प्रकार और उनकी उपयोगिता पता हो तो आप अपने खानपान को और बेहतर बना सकते हैं। इस लेख में हम आपको आयुर्वेद में बताए गए भोजन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों और इम्युनिटी के बारे में विस्तार से बता रहे हैं। आइये सबसे पहले इम्युनिटी के बारे में जानते हैं।

इम्युनिटी कैसे बनती है :

आयुर्वेद में अग्नि अर्थात पाचक अग्नि को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। हमारे द्वारा खाया गया भोजन इस पाचक अग्नि द्वारा ही अलग अलग धातु में परिवर्तित होता है। आयुर्वेद में सात धातुएं इस क्रम में बताई गयी हैं : प्लाज्मा, रक्त, मांसपेशियां, वसा, हड्डी, बोनमैरो और शुक्र (प्रजनन संबंधित तरल पदार्थ)।

ये सारी धातुएं एक क्रम में हैं और प्रत्येक धातु अग्नि द्वारा पचने के बाद अगली धातु में परिवर्तित हो जाती है। जैसे कि जो आप खाना खाते हैं वो पाचक अग्नि द्वारा पचने के बाद सबसे पहले प्लाज्मा में बदलता है। इसके बाद प्लाज्मा खून में और फिर खून से मांसपेशियां बनती है। इसी तरह यह क्रम चलता रहता है। ओजस इस क्रम का सबसे अंतिम धातु है जिसे आँठवा धातु कहा गया है। यही ओजस धातु हमारे शरीर की इम्युनिटी को बनाती है।

इम्युनिटी या रोग प्रतिरोधक क्षमता रोगों से लड़ने की शक्ति देती है लेकिन इसके लिए आपका खानपान एकदम सही होना चाहिए. तभी आप रोगों से दूर रह सकते हैं। आयुर्वेद में खाना कैसे खाएं, कब और कितनी मात्रा में खाएं, इन सबके बारे में कुछ नियम बताए गये हैं। उन नियमों का पालन करने से शरीर की इम्युनिटी मजबूत होती है और शरीर सेहतमंद रहता है। आइये उन नियमों के बारे में जानते हैं.

भोजन के प्रकार :

आयुर्वेद में भोजन के कई प्रकार बताए गए हैं आइये उनमें से प्रत्येक के बारे में विस्तार से जानते हैं

चिकनाई युक्त भोजन :

चिकनाई युक्त भोजन से मतलब है ऐसा खाना जिसमें फैट या वसा की मात्रा ज्यादा हो। घी, तेल आदि खाद्य पदार्थ इसी श्रेणी में आते हैं। हालांकि आज कल लोग दिल के रोगों, ब्लड प्रेशर और मोटापे के डर से घी-मक्खन का बिल्कुल भी सेवन नहीं करते हैं। इसकी बजाय वो रुखा भोजन करते हैं। एकदम से रुखा भोजन करना ग़लत है. घी-तेल से बना भोजन स्वादिष्ट बनता है और खाने में आनंद आता है और इससे खाया हुआ भोजन भी आसानी से पच जाता है।

वसा युक्त चीजें पाचक अग्नि को बढ़ाती हैं जिससे मलत्याग करना आसान रहता है। इसलिए घी का सेवन बिल्कुल बंद ना करें बल्कि घी खाएं लेकिन साथ में व्यायाम भी करें।

ताज़ा और गर्म भोजन :

हमेशा ताजे और गर्म भोजन का ही सेवन करें। ताज़ा और गर्म खाना स्वादिष्ट होने के साथ ही आसानी से पच जाता है। यह पाचक अग्नि को बढ़ाता है और वात को संतुलित करता है। जबकि बासी और ठंडा खाना भारी और हानिकारक होता है।

आयुर्वेद के अनुसार खाने को फ्रिज में रखकर बाद में गर्म करके खाना भी ठीक नहीं है। इसी तरह प्रिजरवेटिव डालकर भोजन को सुरक्षित रखना, डिब्बाबंद पेय, केक, पेस्ट्री आदि का सेवन भी उचित नहीं माना गया है। आज दुनिया की एक बहुत बड़ी आबादी मोटापे की शिकार है उसका एक मुख्य कारण इन सब चीजों का सेवन भी है।

भोजन को आकर्षक बनाकर खाएं :

खाना ऐसा होना चाहिए जिसके रंग, स्वाद या खुशबू से ही उसे खाने का मन करें। ऐसा सुंदर भोजन करने से दूसरे पाचक रसों का स्राव भी अच्छी तरह से होता है। इसलिए अगली बार जब खाना खाएं तो साफ़ सुथरे बर्तन का प्रयोग करें और खाने को अच्छी तरह सजा कर खाएं। रोजाना बदल बदल कर पौष्टिक चीजें खाएं क्योंकि एक ही खाना रोज़ खाने से उससे मन भर जाता है।

खाने का तरीका :

स्वस्थ जीवन के लिए  भोजन में पौष्टिक चीजों के साथ साथ उसे खाने का सही तरीका भी पता होना चाहिए अगर आप अच्छा खाना भी गलत तरीके से खा रहे हैं तो इससे शरीर को उतने फायदे नहीं मिलते हैं आइये जानते हैं कि आयुर्वेद में खाना खाने का क्या सही तरीके बताए गए हैं

शांत जगह पर खाएं :

आज कल लोग टीवी देखते हुए या मोबाइल चलाते हुए खाना खाते हैं। यह खाना खाने का बिल्कुल ही ग़लत तरीका है। आयुर्वेद में बताया गया है कि खाने को साफ़ सुथरी और शांत जगह पर मन लगाकर खाएं। इससे खाना अच्छे से पचता भी है।

आयुर्वेद में जूते-चप्पल पहनकर खाना खाने से मना किया गया है। ऐसा बताया गया है कि जूतों के कारण पैरों की गर्मी पाचक अग्नि को धीमी करती है। इसीलिए आयुर्वेद में भोजन करने से पहले हाथ पैर धोने और जमीन पर बैठकर खाने का नियम बनाया गया है। इसके अलावा खड़े होकर भोजन करने को भी मना किया गया है।

ख़ुशी मन से खाना खाएं :

हमेशा ख़ुशी मन से खाना खाएं। अगर आप गुस्से, तनाव, चिंता या घबराहट में खाना खा रहे हैं तो एक तो इससे खाने का स्वाद नहीं मिलता है। और दूसरा इससे पाचक रसों का स्राव भी ठीक से नहीं हो पाता है। आयुर्वेद में भोजन करते समय बेकार की बातें करने, या कुछ अप्रिय सुनने और देखने से मना किया गया है। अगर आप दुखी या तनाव में हैं और खाना खा रहे हैं तो यह ठीक से पचता भी नहीं है।

चबाकर खाएं :

आप जो भी खाना खाते हैं वो सबसे पहले मुंह में मौजूद लार से मिलता है उसके बाद पेट में जाता है। खाने को आप जितनी देर तक दांतों से चबाकर खायेंगे उसमें उतना ही लार घुलता मिलता रहता है। लार में मिलने से खाना एकदम मुलायम हो जाता है और आसानी से पच जाता है।

अगर आप ठीक से चबाकर नहीं खाते हैं तो खाना उसी ठोस रुप में ही पेट के अंदर चला जाता है और फिर उसे पचाने के लिए आमाशय आदि अंगों को बहुत मेहनत करनी पड़ती है। इससे दो तरह के नुकसान हैं : पहला ज्यादा मेहनत करने की वज़ह से आमाशय और बाकी अंग कमजोर पड़ने लगते हैं। दूसरा पाचन ठीक से ना होने की वजह से कब्ज़, एसिडिटी और अपच जैसी समस्याएं होती हैं। इसलिए कुछ भी खाएं तो उसे खूब चबाकर खाएं।

खाना खाने का सही समय :

चरक संहिता में बताया गया है कि अगर आप ख़ुद को निरोग रखना चाहते हैं तो ठीक समय पर खाना ज़रुर खाएं। भोजन को ठीक तरह से पचने के लिए उसका सही समय पर सेवन बहुत ज़रूरी है। आयुर्वेद में बताया गया है कि जब भूख लगे और ऐसा महसूस हो कि जो पहले खाया था वो पच गया है तब भोजन करना चाहिए। इसी तरह जब पेट और ह्रदय में भारीपन ना हो और मल-मूत्र का त्याग कर चुकें हों तब ही भोजन करना चाहिए।

ऐसा ना करने पर पहले खायी हुई चीजों का अधपचा रस और अभी खायी जाने वाली चीजों का रस, दोनों मिलकर सभी दोषों को असंतुलित कर देते हैं। जिससे कई तरह की बीमारियां होने लगती हैं।

अगर पित्त दोष बढ़ा हुआ है तो दोपहर 12 से 2 के बीच में खाना खाएं। इससे भोजन जल्दी और अच्छी तरह पचता है। यह भी देखा गया है कि भोजन का निश्चित समय आने पर अपने आप खाने की इच्छा होने लगती है। ऐसे में ज़रूर खाना चाहिए क्योंकि इस समय शरीर में पाचक रसों का स्राव पर्याप्त मात्रा में होता है।

भोजन का सही समय पर बीत जाने के बाद वात दोष बढ़ जाता है और इससे पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है। कमजोर पाचन शक्ति की वज़ह से खाना ठीक से पचता ही नहीं है।

अगर भूख लगी है फिर भी आप उस समय खाना नहीं खा रहे हैं तो इससे शरीर में कमजोरी, दर्द, थकावट, त्वचा के रंग में बदलाव और दृष्टि में कमी जैसी समस्याएं होने लगती हैं। इसलिए रोजाना सही समय पर खाना खाएं।

कितनी मात्रा में खाना खाएं :

अब तक आप भोजन के प्रकार, उन्हें खाने का तरीका और खाने का सही समय सब जान चुके हैं। लेकिन इन सबसे ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि खाने की मात्रा कितनी होनी चाहिए? कई लोग खाने का स्वाद पसंद होने पर बहुत ज्यादा खाने लगते हैं वहीं कुछ लोग शुरुआत से ही कम खातें हैं। दोनों ही सही तरीका नहीं है।

सभी पोषक तत्व प्राप्त करने के लिए भोजन का संतुलित मात्रा में सेवन ज़रूरी है। आयुर्वेद के अनुसार, खाना खाने के बाद पेट का एक तिहाई हिस्सा खाली होना चाहिए। जिससे पाचक रस और कफ दोनों भोजन के साथ अच्छे से मिल जाएं और उसे पचा सकें। इससे पेट में बनने वाली गैस का संचालन भी ठीक से होता रहता है। भोजन करने के बाद अगर पेट में भारीपन ना महसूस हो, उठने-बैठने, चलने और सोने में कोई दिक्कत ना हो तो समझ लें कि आपने सही मात्रा में भोजन किया है।

भोजन की मात्रा की बात करें तो किसी को भी अपनी प्रकृति, उम्र, पाचक अग्नि की क्षमता और अग्नि की तीव्रता के आधार पर इसका निर्णय करना चाहिए। अगर आपकी पाचन शक्ति मजबूत है तो आप थोड़ा ज्यादा खा भी लेंगे तो कोई दिक्कत नहीं होगी। लेकिन अगर पाचन शक्ति कमजोर है तो ज्यादा खाने पर कई तरह की दिक्कतें हो सकती हैं।

अगर आप आसानी से पचने वाली चीजें जैसे कि मूंग, चावल आदि का थोड़ा अधिक मात्रा में सेवन कर लेते हैं तो ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। लेकिन अगर आप इन चीजों को भी बहुत ज़्यादा मात्रा में खा रहे हैं तो ये पचेंगे नहीं। इसी तरह अगर उड़द जैसे भारी पदार्थों का सेवन थोड़ी मात्रा में करें या फिर इसमें अजवायन, हींग आदि डालकर इसे सुपाच्य बना लें ये भारी मानी जाने वाली चीजें भी आसानी से पच जाती हैं। इसलिए इन सब बातों का ख़ास ध्यान रखें।

इसे ऐसे समझें कि अगर आप कम भोजन करते हैं तो उससे शरीर को काम करने की शक्ति ठीक से नहीं मिल पाती हैं। वहीं अगर आप बहुत अधिक भोजन कर रहे हैं तो इससे आलस, भारीपन, मोटापा और अपच जैसी बीमारियां होने लगती हैं। इसलिए भूख लगने पर अपनी पाचन शक्ति के अनुसार, ना कम ना ज्यादा बल्कि सीमित मात्रा में भोजन करें।

भोजन की अनुकूलता :

खाने -पीने की कोई एक ही चीज़ आपके लिए फायदेमंद हो सकती है तो किसी और के लिए वो नुकसानदायक भी सकती है। भोजन से सभी पोषक तत्व प्राप्त करने के लिए आपको अपने अनुकूल भोजन का ही सेवन करना चाहिए। इसका पता आप अपनी प्रकृति और अनुभव के आधार पर ही लगा सकते हैं।

आयुर्वेद में भोजन की अनुकूलता को तीन भागों में बांटा गया है।

शरीर के लिए फायदेमंद चीजें खाएं :

ऐसी चीजें जो आपके शरीर को और अधिक सेहतमंद बनाती हों उनका सेवन करना चाहिए।

अपने देश या स्थान के आधार पर करें भोजन का चुनाव :

आप जिस जगह पर रहते हैं वहां के मौसम और जलवायु के अनुकूल चीजों का सेवन करना चाहिए। जैसे कि बंगाल, मद्रास, केरल या कश्मीर में रहने वाले लोगों के लिए चावल खाना उचित है। वहीं उत्तराखंड या हिमाचल प्रदेश जैसी ठंडी जगहों पर गर्म तासीर वाली चीजें खाना फायदेमंद होता है। इसी तरह आप भी अपने रहने वाली जगह के आधार पर खाने वाली चीजों का चुनाव करें।

मौसम के अनुसार खाना खाएं :

आयुर्वेद में बताया गया है कि मौसम के बदलने पर हमें अपना खानपान भी बदल देना चाहिए। मौसम के अनुकूल खाना खाने से बीमार होने की संभावना कम हो जाती है। जैसे कि जाड़ों के मौसम में गर्म चीजें खाएं और गर्मी के दिनों में ठंडी तासीर वाली चीजें खाएं।

रोग और भोजन का परस्पर संबंध :

कई रोग ऐसे होते हैं जिनमें कुछ ख़ास खाद्य पदार्थों का सेवन करने से वे जल्दी ठीक होते हैं। इन्हें ही रोगसात्म्य भोजन कहा जाता है। जैसे कि सर्दी-जुकाम होने पर अदरक और शहद का सेवन करना फायदेमंद होता है। इसलिए अगली बार जब आप बीमार पड़े तो उस रोग में फायदा पहुंचाने वाली चीजों का सेवन करें।

आप खाने पीने से जुड़े जितने नियम ऊपर बताए गये हैं उनका पालन करते हैं तो बीमारी होने की संभावना बहुत कम हो जाती है। अगर फिर भी किसी वजह से आप बीमार होते हैं तो रोगों के अनुकूल भोजन करके आप बीमारी को बढ़ने से रोक सकते हैं और जल्दी स्वस्थ हो सकते हैं। इसमें दवाइयों या औषधियों की ज़रूरत ही नहीं पड़ती है। इसी तरह बीमार पड़ने पर आप दवाइयां तो  बहुत अच्छी तरह नियम से खा रहे हैं लेकिन रोग के अनुकूल भोजन नहीं कर रहे हैं तो जान लें कि ऐसे में बीमारी से जल्दी आराम नहीं मिल पायेगा।

भोजन संबंधी ये जितने भी नियम हैं सब मिलकर आहार-संहिता कहलाती है। आज के समय में भी अगर आप खुद को स्वस्थ और निरोग रखना चाहते हैं तो इस आहार-संहिता का गंभीरता से पालन करें।

और पढ़ेंत्वचा रोग में शाल के फायदे

आचार्य श्री बालकृष्ण

आचार्य बालकृष्ण, स्वामी रामदेव जी के साथी और पतंजलि योगपीठ और दिव्य योग मंदिर (ट्रस्ट) के एक संस्थापक स्तंभ है। उन्होंने प्राचीन संतों की आध्यात्मिक परंपरा को ऊँचा किया है। आचार्य बालकृष्ण जी एक प्रसिद्ध विद्वान और एक महान गुरु है, जिनके मार्गदर्शन और नेतृत्व में आयुर्वेदिक उपचार और अनुसंधान ने नए आयामों को छूआ है।

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