टाइप 2 डायबिटीज

डिस्क्रिप्सन

परिभाषा

टाइप 2 डायबिटीज (जिसे नॉन-इन्सुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज या एडल्ट ओन्सेट डायबिटीज के नाम से भी जाना जाता है) एक ऐसा रोग है जिसमें शरीर में खून में ग्लूकोज का स्तर लगातार सामान्य से ऊपर रहता है। इन्सुलिन एक ऐसा हारमोन है जो खून में ग्लूकोज के स्तर को नियमित करता है। इन्सुलिन, शरीर में अग्नाशय द्वारा पैदा होता है। यह कई तरह से आपके खून में ग्लूकोज के स्तर को नियमित करता है। डायबिटीज के मामले में, शरीर में इन्सुलिन की कमी हो सकती है या ऊतक स्तर पर इन्सुलिन की क्रिया का प्रतिरोध कर सकता है, या दोनों हो सकता है।  
 
कारण और जोखिम कारक

1. आनुवंशिक कारक: यदि आपके माता-पिता, दादा-दादी या भाई-बहन को डायबिटीज है तो आपको भी डायबिटीज होने का ज्यादा खतरा है। 
2. जन्म में मौजूद कारक: जन्म के समय कम वजन का होना आगे चलकर टाइप 2 डायबिटीज के साथ जुड़ा होता है।
3. उम्र: जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे आपको डायबिटीज होने की सम्भावना भी बढ़ती जाती है, ख़ास तौर पर 45 साल के बाद।
4. वसा का वितरण: बढ़ी हुई वसा, पेट वाले क्षेत्र में जाकर जमा हो जाता है जिससे आपको टाइप 2 डायबिटीज होने का खतरा बढ़ जाता है।
5. मोटापा: ज्यादा वजन भी डायबिटीज का एक प्रमुख जोखिम कारक है।
6. व्यायाम का अभाव: निष्क्रियता के फलस्वरूप वजन में वृद्धि होती है और आपके शरीर में वसा का अधिक जमाव होता है और इस तरह डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है।
7. धूम्रपान
8. आहार: कम फाइबर, अधिक वसा और चीनी वाला आहार लेने से वजन बढ़ सकता है और अंत में डायबिटीज हो सकती है।
9. तनाव
 
संकेत और लक्षण

डायबिटीज के आम संकेतों और लक्षणों में शामिल है:
1. पेशाब की बारंबारता और मात्रा में वृद्धि
2. प्यास में वृद्धि
3. वजन कम होना  
4. धुंधली नजर  
5. थकान
6. त्वचा संक्रमण
 
जांच-पड़ताल

1. खाली पेट और लंच के बाद ब्लड शुगर की जांच: खाली पेट यानी रात भर लगभग 8 से 12 घंटे उपवास रहने के बाद और उसके बाद लंच करने के 2 घंटे बाद खून में ग्लूकोज के स्तर की जांच। इससे किसी भी रोगी में डायबिटीज के लिए बुनियादी नित्य जांच पूरी हो जाती है।
2. एचबीए1सी (ग्लाइकोसाइलेटेड हीमोग्लोबिन): यह वह जांच है जो आपको पिछले 3 महीने के दौरान खून में ग्लूकोज के स्तर का औसत अनुमान देता है।  
3. ग्लूकोज टोलरेंस टेस्ट: यह उन रोगियों में दाय्बित्ज की पहचान करने में मदद करता है जिनके शरीर में खाली पेट ग्लूकोज की मात्रा बहुत अधिक है। इस जांच से, मौखिक रूप से सेवन करने पर, दिए गए परिणाम में ग्लूकोज का उपयोग करने की शरीर की क्षमता की माप होती है।
किए जा सकने वाले अन्य जांच-पड़ताल हैं यूरिन फॉर प्रोटीन, कम्प्लीट ब्लड काउंट, यूरिया और इलेक्ट्रोलाइट्स, लिपिड प्रोफाइल और लीवर फंक्शन टेस्ट।
 
इलाज

1. टाइप 2 डायबिटीज का इलाज करने के लिए बाजार में तरह-तरह की दवाइयाँ मिलती हैं। 
2. डायबिटीज के कारण, डायबिटीज की गंभीरता और किसी अन्य बीमारी की मौजूदगी या गैर मौजूदगी के आधार पर आपका डॉक्टर आपको ओरल हाइपोग्लाईसेमिक्स या इन्सुलिन जैसी दवाइयाँ लेने की सलाह देगा।
 
जटिलताएं और आपको डॉक्टर के पास कब जाना चाहिए
 
टाइप 2 डायबिटीज की विविध जटिलताओं की समय पर पहचान करने के लिए आपको नियमित रूप से अपने डॉक्टर के पास जाना चाहिए, बताए गए अनुसार इलाज करवाना चाहिए और कहे गए अनुसार सभी जांच करवाने चाहिए।  
1. कार्डियोवैस्कुलर (हृदय) रोग
2. डायबिटिक नेफ्रोपैथी: अनियंत्रित डायबिटीज, किडनी के कामकाज में बाधा डालता है। किडनी फेल होने या अपरिवर्तनीय रूप से किडनी के ख़राब होने पर किडनी गंभीर रूप से ख़राब हो सकती है। 
3. डायबिटिक न्यूरोपैथी:  खून में ग्लूकोज का स्तर लगातार ऊपर रहने से नसों को, ख़ास तौर पर पैरों और बांहों की नसों को चोट पहुँचती है। इसे डायबिटिक न्यूरोपैथी कहा जाता है। इससे झुनझुनी, सुन्नता, जलन या दर्द होता है जो पैर के पंजों या अँगुलियों के पोरों से शुरू होकर धीरे-धीरे ऊपर की तरफ फैलता चला जाता है। इसलिए इसे ‘सॉक्स एण्ड ग्लोव्स’ पैटर्न कहा जाता है। अनियंत्रित बीमारियों के कारण अंत में प्रभावों अंगों में तरह-तरह की संवेदना का नुकसान हो सकता है जैसे तापमान, दबाव, दर्द, कम्पन का अनुभव इत्यादि।  
4. डायबिटिक रेटिनोपैथी: डायबिटीज, रेटिना की रक्त वाहिनियों को ख़राब कर देता है जिसका समय पर इलाज न करने पर आदमी अँधा हो सकता है। 
5. पैर का नुकसान: नस के नुकसान और निचले अंगों में खून की कम आपूर्ति के कारण पैर के नुकसान को डायबिटिक पैर कहा जाता है। ऐसा अनियंत्रित डायबिटीज के परिणामस्वरूप होता है और इसके परिणामस्वरूप अंत में प्रभावित पंजे या पैर को काटना भी पड़ सकता है। 
6. इन्फेक्शन या संक्रमण
 
 
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Last updated on:
28 Dec 2016 | 12:02 AM (IST)
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